"वो बड़ा मुख़लिस, बड़ा दिलनवाज़, बड़ा प्यारा इंसान था। वह सबका दोस्त था, सिर्फ़ अपना दुश्मन था। उसने अपनी शायरी, अपनी सेहत, अपनी ज़िंदगी, सब अपनी कमज़ोरी की नज़र कर दी। हम सब देखते रहे और कुछ न कर सके। उसकी शायरी ख़ूबसूरत, पुरसोज़, जवान और जानदार है, जो ज़िंदा रहेगी। उसे तो वक्त का ज़ालिम हाथ भी नहीं मिटा सकता। उसकी जेहानत, उसकी मोहब्बत, उसकी दिलरुबा शख्सियत और उसकी ज़िंदा दिली की याद उसके दोस्तों के दिल से कभी महव ना होगी।"
ये जुमले प्रोफ़ेसर आले अहमद सुरूर ने मजाज़ लखनवी के बारे उनके वालिद जनाब सिराज उल हक़ को मजाज़ के इंतकाल के तीन दिन बाद ताजियाती ख़त में लिखे थे। मगर क्या मजाज़ का तार्रुफ़ और उसकी मीरास बस यही है?
मजाज़ यानी वो असरार जिसे दुनिया आज उसकी मौत के 67 साल भी समझने की कोशिश में मुब्तला है। जिसके इश्क़, जुनून, मुहब्बत, हाजिरजवाबी, मयनोशी, और मौत के इर्द गिर्द इतने किस्से सुने-सुनाये गये हैं कि उनमें कौन सच और कौन अफ़वाह, फर्क करना मुश्किल है। वो शायर जिसकी शायरी लोगों की ज़िन्दगी बन गयी, और जिसकी ज़िन्दगी ख़ुद में एक ग़मनाक शायरी। जो कहता था,
ख़ूब पहचान लो असरार हूँ मैं
जिंस-ए-उल्फ़त का तलबगार हूँ मैं
इश्क़ ही इश्क़ है दुनिया मेरी
फ़ित्ना-ए-अक़्ल से बे-ज़ार हूँ मैं
ये दुनिया अफसाने पसंद करती है, इसे हज़ार रातों का अफ़साना चाहिए, ये कभी अफसानों से उबती नहीं, शायद इसीलिए इसने मजाज़ की हकीकत में भी अफ़साने ही ढूंढे। मगर मजाज़ को उसके अधूरे इश्क़ और मयनोशी के अफ़सानों से अलग उसके इन्क़लाबी तेवर के साथ भी देखा जाना चाहिए।
मजाज़ की ज़िन्दगी हर तौर ख़ुद में एक इंक़लाब थी। उसने केवल इंक़लाब लिखा नहीं, बल्कि जिया भी। चाहे वो वालिद की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ इंजीनियरिंग न करने का फैसला हो, या सरकारी नौकरी में रहकर सरकार के ख़िलाफ़ नज़्में लिखना हो या फिर समाजी हदों के पार मुहब्बत करने की जुर्रत। ये सब मजाज़ के इन्क़लाबी ज़ेहन के एक्सटेंशन ही थे। और शायद इन्हीं में उसने ख़ुद को डुबा दिया।
कमाल-ए-इश्क़ है दीवाना हो गया हूँ मैं
ये किस के हाथ से दामन छुड़ा रहा हूँ मैं
तुम्हीं तो हो जिसे कहती है नाख़ुदा दुनिया
बचा सको तो बचा लो कि डूबता हूँ मैं
मजाज़ के मजमुआ ए कलाम के दीबाचे में फैज़ अहमद फैज़ कहते हैं, “मजाज़ की इंक़लाबियत आम इन्क़लाबी शायरों से अलग है। वो इंक़लाब को लेकर सीना कूटते हैं, गरजते हैं। मजाज़ इंक़लाब का मुतरिब है।” मजाज़ इंक़लाब को नगमों में ढाल देता है और गाता है
नहीं ये फ़िक्र कोई रहबर-ए-कामिल नहीं मिलता
कोई दुनिया में मानूस-ए-मिज़ाज-ए-दिल नहीं मिलता
कभी साहिल पे रह कर शौक़ तूफ़ानों से टकराएँ
कभी तूफ़ाँ में रह कर फ़िक्र है साहिल नहीं मिलता
शिकस्ता-पा को मुज़्दा ख़स्तगान-ए-राह को मुज़्दा
कि रहबर को सुराग़-ए-जादा-ए-मंज़िल नहीं मिलता
वहाँ कितनों को तख़्त ओ ताज का अरमाँ है क्या कहिए
जहाँ साइल को अक्सर कासा-ए-साइल नहीं मिलता
ये क़त्ल-ए-आम और बे-इज़्न क़त्ल-ए-आम क्या कहिए
ये बिस्मिल कैसे बिस्मिल हैं जिन्हें क़ातिल नहीं मिलता
मजाज़ कहीं किनारे खड़े होकर नारे नहीं लगाता, वो किसी आम नौजवान की तरह आज के हालात पर रोता भी है, उसे बदलने के लिए मुट्ठियाँ भी भींचता है, और बेहतर कल के हसीन
ख़्वाब भी देखता है।
आवारा ओ मजनूँ ही पे मौक़ूफ़ नहीं कुछ
मिलने हैं अभी मुझ को ख़िताब और ज़ियादा
उट्ठेंगे अभी और भी तूफ़ाँ मिरे दिल से
देखूँगा अभी इश्क़ के ख़्वाब और ज़ियादा
टपकेगा लहू और मिरे दीदा-ए-तर से
धड़केगा दिल-ए-ख़ाना-ख़राब और ज़ियादा
चूँकि मजाज़, बकौल फैज़ अहमद फैज़, “इंक़लाब के ढिंढोरची” नहीं है, बाज़ दफ़ा उसके अशआर तरक्क़ी-पसंद और इन्क़लाबी होते हुए भी इश्क़िया लगते हैं। और शायद यही मजाज़ की शायरी का ख़ासा है।
ये बिजली चमकती है क्यूँ दम-ब-दम
चमन में कोई आशियाना भी है
ख़िरद की इताअत ज़रूरी सही
यही तो जुनूँ का ज़माना भी है
न दुनिया न उक़्बा कहाँ जाइए
कहीं अहल-ए-दिल का ठिकाना भी है
मुझे आज साहिल पे रोने भी दो
कि तूफ़ान में मुस्कुराना भी है
ज़माने से आगे तो बढ़िए 'मजाज़'
ज़माने को आगे बढ़ाना भी है
आज से कई दहाई पहले जब फेमिनिज्म लफ्ज़ इतना आम नहीं था तब मजाज़ ने वो नज़्म कही जो आज भी हुक़ूक़ ए निस्वां और आज़ादी का ज़िक्र होने पर दिल बेसाख्ता गा उठता है
हिजाब-ए-फ़ित्ना-परवर अब उठा लेती तो अच्छा था
ख़ुद अपने हुस्न को पर्दा बना लेती तो अच्छा था
तिरी नीची नज़र ख़ुद तेरी इस्मत की मुहाफ़िज़ है
तू इस नश्तर की तेज़ी आज़मा लेती तो अच्छा था
तिरे माथे पे ये आँचल बहुत ही ख़ूब है लेकिन
तू इस आँचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था
और अगर बात सर्वहारा वर्ग की हो तो मजाज़ की नज़्म “मज़दूरों का गीत” याद आती है
मेहनत से ये माना चूर हैं हम
आराम से कोसों दूर हैं हम
पर लड़ने पर मजबूर हैं हम
मज़दूर हैं हम मज़दूर हैं हम
जिस सम्त बढ़ा देते हैं क़दम
झुक जाते हैं शाहों के परचम
सावंत हैं हम बलवंत हैं हम
मज़दूर हैं हम मज़दूर हैं हम
जिस रोज़ बग़ावत कर देंगे
दुनिया में क़यामत कर देंगे
ख़्वाबों को हक़ीक़त कर देंगे
मज़दूर हैं हम मज़दूर हैं हम
और अंत में वो नज़्म जिसका ज़िक्र किये बिन मजाज़ ही नहीं पूरे तरक्क़ी-पसंद उर्दू अदब की बात पूरी नहीं हो सकती। “आवारा” नज़्म ने मजाज़ को एक नयी पहचान दी। उस दौर के हर नौजवान की बेचैनी और जद्दोजेहद को जैसे आवाज़ मिल गयी थी। “आवारा” का एहतिजाज, उसकी बग़ावत, कोरा भाषण या नारा नहीं है, उसमें रूमानियत है। रूमानियत जो वक़्त से परे हैं। और शायद इसीलिए ये नज़्म आज भी अदब का जौक रखने वाले नौजवानों को पसंद आती है। बकौल अली सरदार जाफ़री, “यह नज़्म नौजवानों का ऐलाननामा थी और आवारा का किरदार उर्दू शायरी में बग़ावत और आज़ादी का पैकर बनकर उभर आया है.”
शहर की रात और मैं नाशादो-नाकारा फिरूं
जगमगाती जागती सड़कों पे आवारा फिरूं
ग़ैर की बस्ती है कब तक दर-ब-दर मारा फिरूं
ए-ग़मे-दिल क्या करूं? ऐ वहशते-दिल क्या करूं?
मजाज़ की शख्शियत और शायरी को लोगों ने अपने अपने तरीके से देखा, और सभी को अपने मतलब का कुछ उसमें मिल ही गया। किसी को रात भर जागने वाला जग्गन मिला, तो किसी को अधूरे इश्क़ के ग़म में डूबा आशिक़, किसी ने उसमें उर्दू अदब का कीट्स देखा, तो किसी ने इंक़लाब का मुतरिब, किसी को ख़ुशमिज़ाज, ख़ुशलिबास मजाज़ मिला जिसपर यूनिवर्सिटी की लड़कियाँ फ़िदा थीं, तो किसी को शराब के नशे में डूबा मजाज़ मिला जो तन्हाई का मारा था, किसी को उसकी हाजिरजवाबी के लतीफ़े मिले तो किसी को उसकी दीवानगी के हौलनाक क़िस्से। मगर सचमुच मजाज़ कौन था ये असरार शायद हमेशा बने ही रहेंगे।
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