मख़दूम ने उस्मानिया यूनिवर्सिटी से उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद सिटी कॉलेज में बतौर उर्दू लेक्चरर काम करना शुरू किया। उसी बीच 1936 में लखनऊ से अंजुमन-ए-तरक़्क़ी पसंद मुसन्निफ़ीन की शुरुआत हुई, जिससे प्रेरित होकर मख़दूम ने सिब्ते हसन, एम. नरसिंह राव, अख़्तर हुसैन रायपुरी और डॉ. जय सूर्या नायडू के साथ मिलकर हैदराबाद में प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन की स्थापना की। कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया के सदस्य बनकर उन्होंने सिटी कॉलेज की नौकरी छोड़ दी और पूरी तरह किसानों व मजदूरों के हक़ की लड़ाई में कूद पड़े। अलग-अलग ट्रेड यूनियन के नेतृत्व की कमान हाथ में लेकर आजीवन मेहनतकश के हक़ के लिये आवाज़ उठाते रहे। साल 1946 में जब तेलंगाना के किसानों ने निज़ामशाही के ख़िलाफ़ जंग छेड़ी तो मख़दूम हाथ में क़लम और कंधे पर बन्दूक़ लेकर निज़ाम के ख़िलाफ़ खड़े हो गये, तभी हैदराबाद के निज़ाम ने मख़दूम के सर पर 5 हज़ार रुपये इनाम की घोषणा कर दी थी।
लेकिन इन सब बातों से तो मख़दूम की शख़्सियत का सिर्फ़ एक ही चेहरा दिखता है, इन्क़लाबी शायर मख़दूम का चेहरा, मगर एक चेहरा वो भी है जो
"फिर छिड़ी रात, बात फूलों की
रात है या बरात फूलों की "
और
"आप की याद आती रही रात-भर
चश्म-ए-नम मुस्कुराती रही रात-भर"
में नुमाया होता है। बकौल उर्दू के मशहूर अफ़सानानिगार जनाब ख़्वाज़ा अहमद अब्बास "मख़दूम एक धधकती ज्वाला थे और ओस की ठंडी बूँदें भी। वे क्रान्तिकारी छापामार की बन्दूक़ थे और संगीतकार का सितार भी। वे बारूद की गंध थे और चमेली की महक भी"।
उर्दू शाइरी में फ़ैज़ की ही तरह मख़दूम ऐसे शायर हैं जिनके यहाँ इन्क़लाब का सूरज भी रूमानी चाँदनी ओढ़ के आता है या यूँ कहूँ कि इनकी मुहब्ब्बत भी दुनिया की तरक़्क़ी की राहों में खड़े पर्बतों को काटने के लिये तेशा बन जाती है।
"इश्क़ के शोले को भड़काओ कि कुछ रात कटे
दिल के अंगारे को दहकाओ कि कुछ रात कटे
हिज्र में मिलने शब-ए-माह के ग़म आये हैं
चारासाज़ों को भी बुलवाओ कि कुछ रात कटे"
एक तरफ मख़दूम तेलंगाना विद्रोह में ग़रीब किसानों को निज़ामशाही के शोषण से आज़ादी दिलाने के लिये ख़ुद बन्दूक़ उठाते हैं तो दूसरी तरफ़ अपनी नज़्म "जंग" में कहते हैं कि
"निकले दहान-ए-तोप से बर्बादियों के राग
बाग़-ए-जहाँ में फैल गयी दोज़ख़ों की आग"
एक तरफ़
"हयात ले के चलो काएनात ले के चलो
चलो तो सारे ज़माने को साथ ले के चलो"
को नारा बनाते हैं तो दूसरी तरफ़ "इन्तिज़ार" नज़्म में गाते हैं कि
"रात भर दीदा-ए-नमनाक में लहराते रहे
साँस की तरह से आप आते रहे, जाते रहे
ख़ुश थे हम अपनी तमन्नाओं का ख़्वाब आयेगा
अपना अरमान बर-अफ़गन्दा-नक़ाब आयेगा"
तो मन में सवाल उठता है कि ये इन्तिज़ार किसका है? अपने महबूब का? या आने वाले ख़ूबसूरत वक़्त का? या दोनों का?
बाग़ी मख़दूम जब शायर मख़दूम पर हावी होता है तो वो कहते हैं
"राद हूँ, बर्क़ हूँ, बेचैन हूँ, पारा हूँ मैं
ख़ुद-परस्तार, ख़ुद-आगाह, ख़ुद-आरा हूँ मैं
ख़िर्मन-ए-जौर जला दे वो शरारा हूँ मैं"
और जब इस बाग़ी को शायर गिरफ़्त में लेता है तो वो पूछते हैं
"ये बता चारा-गर तेरी ज़म्बील में
नुस्ख़ा-ए-कीमिया-ए-मुहब्बत भी है?
कुछ इलाज-ओ-मुदावा-ए-उल्फ़त भी है?"
मख़दूम को जितना ही पढ़ा जाये उनके अलग-अलग रंग नुमाया होते जाते हैं मगर एक बात जो नहीं बदलती वो है उम्मीद.. आने वाली दुनिया के ख़्वाब.. और उनको सच करने का जूनून।
"मोहब्बत को तुम लाख फेंक आओ गहरे कुएँ में
मगर एक आवाज़ पीछा करेगी
कभी चाँदनी रात का गीत बन कर
कभी घुप अँधेरे की पगली हँसी बन के
पीछा करेगी
मगर एक आवाज़ पीछा करेगी"
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया के संस्थापक एस. ए. डांगे के अनुसार ‘मख़दूम शायर-ए-इंक़लाब है, मगर वह रुमानी शायरी से भी दामन नहीं बचाता, बल्कि उसने ज़िन्दगी की इन दोनों हक़ीक़तों को इस तरह जमा कर दिया है कि इंसानियत के लिये मोहब्बत को इंक़लाब के मोर्चों पर डट जाने का हौसला मिलता है'।
इन सब बातों से परे एक क़िस्सा यूँ भी है कि जब 25 अगस्त, 1969 को मख़दूम ने इस दुनिया-ए-फ़ानी को अलविदा कह दिया तो हज़ारों लोग उनके जनाज़े में शामिल हुए। लोग इस तरह रो रहे थे जैसे उनके ही परिवार का कोई चला गया हो। फिर धीरे-धीरे मख़दूम साहब की क़ब्र पर लोगो का आना-जाना कम होने लगा। मगर उनकी क़ब्र पर हर रोज़ एक लाल गुलाब आता रहा। किसी को नहीं पता था कि वो गुलाब कौन भेजता है या कौन छोड़ जाता है, मगर वो फूल आते रहे...
"फूल खिलते रहेंगे दुनिया में
रोज़ निकलेगी बात फूलों की"
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